वंश

अठारह गोत्र

महाराजा अग्रसेन के अठारह पुत्रों में से हर एक का जन्म एक अलग यज्ञ से हुआ, जिसे एक अलग वैदिक ऋषि ने कराया। पुत्रों ने अपने ऋषि का नाम अपना गोत्र बनाया — और ये अठारह वंश आज भी अग्रवाल समाज की रीढ़ हैं।

A hand-painted saffron and gold lotus mandala on aged cream parchment: a ring of saffron lotus petals, each with a small gold dot, and an outer ring of gold lotus buds, around a central gold lotus holding a lit diya, inside a thin deep-red double border — a motif for the eighteen Aggarwal gotras as one lineage.

मंडल

अठारहों गोत्र एक नज़र में

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महाराजाअग्रसेनगर्गगोयलबंसलमित्तलसिंघलजिंदलतायलबिंदलकंसलकुच्छलमधुकुलमंगलधारणभंडलनांगलतिंगलऐरनगोयन

सभी 18 गोत्रों में एक बात समान है: माँ आद्य महालक्ष्मी सबकी कुलदेवी हैं, और अग्रोहा (हरियाणा) सबका ऐतिहासिक मूल स्थान है — महाराजा अग्रसेन का बसाया राज्य। हर गोत्र में अलग है तो बस ऋषि — वह वैदिक ऋषि जिन्होंने उस वंश को जन्म देने वाला यज्ञ कराया।

गोयन के बारे में: अठारहवें यज्ञ में बलि के घोड़े की पीड़ा देखकर महाराजा अग्रसेन ने करुणा से यज्ञ रोक दिया — रूढ़ि की जगह अहिंसा को चुना। पहले गोयन को "आधा गोत्र" (साढ़े सत्रह) कहा जाता था; 1983 में अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन ने सभी वंशों में पूरी बराबरी के लिए गोयन को औपचारिक रूप से अठारहवाँ पूरा गोत्र माना।

समाज का अपना शोध — कोई आधिकारिक अकादमिक प्रमाण नहीं। कुछ ग़लत है? हमें बताएँ →
At a riverside temple town, an elderly priest in a white dhoti and saffron shawl turns the pages of a large red-cloth-bound register on a low wooden table, while a man in a cream kurta and his mother in a red silk sari lean in to read; stacks of red-wrapped registers sit behind them and temple spires and boats on the river are visible through the arch.
पंडा जी की बही — पीढ़ियों से परिवार अपने पुरखों और अपने गोत्र को खोजने उसी पंडा के पास लौटते रहे हैं।

गोत्र कैसे सहेजा जाता है

पिता की वंश-परंपरा से आगे बढ़ता, पंडा जी की बही में दर्ज

बच्चा पिता के गोत्र में जन्म लेता है, और बेटी परंपरा से विवाह के बाद पति का गोत्र अपनाती है। इसीलिए शादी से पहले परिवार गोत्र पूछते हैं — दोनों तरफ़ एक ही गोत्र होने से बचा जाता है।

सदियों तक यह लेखा हरिद्वार जैसे तीर्थों पर परिवार के पंडा जी के पास रहा — कपड़े में बँधी लंबी बहियों में, जिनमें आने वाले हर परिवार के नाम, गाँव और गोत्र लिखे जाते थे। इसे अपने वंशवृक्ष में लिख लेने से यह उन पीढ़ियों के लिए भी बचा रहता है जो शायद वह यात्रा कभी न करें।

हर गोत्र

अठारह वंश

गर्ग

ऋषि
गर्गाचार्य
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
पुष्पदेव

अग्रवालों के सबसे पुराने गोत्रों में से एक, ऋषि गर्गाचार्य से चला। गंगा के मैदानी इलाक़े के व्यापारी परिवारों में इसकी अच्छी-ख़ासी संख्या है।

गोयल

ऋषि
गोभिल
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
गेंदुमल

ऋषि गोभिल के नाम पर (कुछ स्रोतों में गौतम भी लिखा मिलता है)। आज अग्रवालों के सबसे बड़े गोत्रों में से एक।

बंसल

ऋषि
वत्स
वेद
सामवेद
गोत्र-पति
वीरभान

ऋषि वत्स से चला। परंपरा से कपड़ा, अनाज और साहूकारी के कारोबार में मज़बूत।

मित्तल

ऋषि
मैत्रेय
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
मंत्रपति

ऋषि मैत्रेय का वंश। आज के उद्योग और व्यापार में अपनी प्रमुखता के लिए जाना जाता है।

सिंघल

ऋषि
शांडिल्य
वेद
सामवेद
गोत्र-पति
सिंधुपति

ऋषि शांडिल्य के वंशज। इतिहास में अनाज और कपड़े के व्यापार से जुड़े रहे।

जिंदल

ऋषि
जैमिनी
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
जैत्रसंघ

ऋषि जैमिनी का वंश, जिन्होंने हिंदू दर्शन के मीमांसा संप्रदाय की स्थापना की।

तायल

ऋषि
तैत्तिरीय
वेद
कृष्ण यजुर्वेद
गोत्र-पति
ताराचंद

कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय परंपरा का नाम धारण करता है।

बिंदल

ऋषि
वशिष्ठ
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
वृंददेव

ऋषि वशिष्ठ से चला — जो सप्तऋषियों में से एक हैं। अक्सर "बिंदल" या "विंदल" लिखा जाता है।

कंसल

ऋषि
कौशिक
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
मणिपाल

ऋषि कौशिक (विश्वामित्र) का वंश। विद्या और वेद-अध्ययन की मज़बूत परंपरा।

कुच्छल

ऋषि
कश्यप
वेद
सामवेद
गोत्र-पति
करणचंद

ऋषि कश्यप के वंशज — जो सप्तऋषियों में से एक हैं, और देवों व असुरों दोनों के पूर्वज माने जाते हैं।

मधुकुल

ऋषि
मुद्गल
वेद
ऋग्वेद / यजुर्वेद
गोत्र-पति
माधवसेन

ऋषि मुद्गल का वंश। आज संख्या में कम, पर अठारह में से एक मूल गोत्र। ऋग्वेद और यजुर्वेद, दोनों परंपराओं से जुड़ा।

मंगल

ऋषि
मांडव्य
वेद
ऋग्वेद / यजुर्वेद
गोत्र-पति
अमृतसेन

ऋषि मांडव्य से चला। ऋग्वेद और यजुर्वेद, दोनों परंपराओं से जुड़ा। (मंगल संस्कृत में शुभ का भी शब्द है, और कभी-कभी इसे मंगल ग्रह देवता से जोड़ दिया जाता है — पर इस गोत्र के ऋषि मांडव्य ही हैं।)

धारण

ऋषि
धौम्य
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
धावनदेव

ऋषि धौम्य का वंश — महाभारत में पांडवों के पुरोहित।

भंडल

ऋषि
भारद्वाज
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
वासुदेव

ऋषि भारद्वाज से चला — जो सप्तऋषियों में से एक और प्रमुख वैदिक द्रष्टा हैं।

नांगल

ऋषि
नागेन्द्र
वेद
सामवेद
गोत्र-पति
नरसेव

ऋषि नागेन्द्र का वंश। कभी-कभी "नागल" भी लिखा जाता है।

तिंगल

ऋषि
तांड्य
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
ताम्बोलकर्ण

ऋषि तांड्य से चला। आज संख्या में कम गोत्रों में से एक।

ऐरन

ऋषि
और्व
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
इंद्रमल

ऋषि और्व का वंश (कहीं-कहीं "आौर्व" भी लिखा जाता है; कुछ क्षेत्रों में इनकी जगह अत्रि ऋषि का नाम लिया जाता है)। अग्रोहाधाम ट्रस्ट के अंग्रेज़ी साहित्य में मुख्य नाम और्व ही है।

गोयन

ऋषि
गौतम
वेद
यजुर्वेद
गोत्र-पति
गोधर

गोयन गोत्र महाराजा अग्रसेन की करुणा की कहानी लिए हुए है। अठारहवें यज्ञ में बलि के घोड़े की पीड़ा देखकर अग्रसेन ने यज्ञ बीच में ही रोक दिया — रूढ़ि की जगह अहिंसा को चुना। 1983 में नई दिल्ली में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में (श्री रामदास अग्रवाल के नेतृत्व में) अखिल भारतीय अग्रवाल सम्मेलन ने गोयन को औपचारिक रूप से अठारहवाँ पूरा गोत्र माना, "आधे गोत्र" वाली बात ख़त्म की और सभी वंशों में पूरी बराबरी पक्की की। आज के वैवाहिक विज्ञापन भी गोयन को एक पूरा, बराबर गोत्र ही मानते हैं।

आपके परिवार का गोत्र नक्शा

देखिए आपका परिवार अठारह गोत्रों में कैसे बँटा है।

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